Thursday, June 27, 2019

تركت مجال التكنولوجيا لتحقق الملايين من مستحضرات التجميل

تركت سابرينا تان، مؤسسة ومديرة العلامة التجارية "سكين إنك" المتخصصة في العناية بالبشرة، عملها في مجال التكنولوجيا من أجل العمل في صناعة مستحضرات العناية بالبشرة، في خطوة أثمرت عن كثير من التحديات بما في ذلك العمل مع النساء.
كانت طبيعة عمل المرأة وحركتها في مكان العمل أمرا جديدا على سابرينا التي نشأت في سنغافورة مع إخوتها الثلاثة، وعملت بعد تخرجها في الجامعة لدى شركات "أي بي أم" و"أوراكل" و"هيوليت-باكارد (إتش بي)" التي يهيمن الرجال على طبيعة العمل بها.
وتقول سابرينا : "اعتدت أن أكون واحدة من بين نساء قليلات داخل فريق العمل".
وسرعان أن أصبحت سابرينا محاطة بعدد كبير من السيدات الأخريات، ولاحظت أن بعضهن يخجلن من طرح أفكارهن على الآخرين، وكانت أخريات يشعرن بعدم استعدادهن للعمل على الرغم من تمتعهن بخبرات ومؤهلات تزيد عن حاجة ومتطلبات شغل الوظيفة.
وتقول سابرينا : "كان الانتقال للعمل في مجال مستحضرات التجميل تغيرا كبيرا بالنسبة لي".
أقدمت سابرينا على اتخاذ الخطوة قبل أكثر من عشر سنوات وانشأت شركة "سكين إنك"، العلامة التجارية التي تتخذ من سنغافورة مقراً لها وتباع منتجاتها الآن في الولايات المتحدة وبريطانيا وفي شتى أرجاء آسيا، وتبلغ عائداتها عشرات الملايين من الدولارات سنويا.
وترجع سابرينا، البالغة من العمر 45 عاما، سبب نجاحها إلى استخدام "عقلية تكنولوجية" واستلهام أفكار من مثلها الأعلى ستيف جوبز، مؤسس شركة أبل، في تأسيس شركة لمستحضرات التجميل.
وتقول : "أردت تأسيس شركة ناجحة مثل أبل ولكن في مجال مستحضرات العناية بالبشرة".
بدأت سابرينا وظيفتها الأولى في مجال التكنولوجيا وتطوير الأعمال، بعد أن درست الاقتصاد وإدارة الأعمال في سنغافورة.
واكتشفت مع الوقت أن سفرها المتكرر الذي يتطلبه العمل أثر على بشرتها المعرضة للإصابة بالأكزيما (الصدفية).
أصيبت سابرينا بحالة إحباط وبدأت تبحث عن حلول لاسيما بعد أن تبين فرط حساسيتها لمواد مثل الأصباغ والألوان، وتأثرها بتغير الأحوال الجوية، كما دفعتها إصابة طفليها الصغيرين بالأكزيما إلى البحث عن حل.
وتقول : "اعتقدت أن هذا جنونا، وعلينا التفكير بطريقة أفضل من الطرق التقليدية التي نتبعها في العناية بالبشرة."
وتضيف : "قررت أن آخذ الأمر بجدية بنفسي".
قررت سابرينا السفر في رحلة إلى اليابان في عام 2007 بهدف جمع معلومات والبحث في إحدى كبرى أسواق مستحضرات التجميل في العالم عن إجابات تتعلق بأسباب عدم نجاح الكثير من المستحضرات في علاج الأكزيما التي تصيب بشرتها.
وتتذكر قائلة : "تحدثت مع صيادلة وعلماء. وزرت صيدليات وأقسام مستحضرات التجميل".
واكتشفت سابرينا أن اليابانيين لديهم ولع بالمكونات التي تحتوي عليها المستحضرات المختلفة، كما تعرفت في النهاية على مختبر يحقق رغبتها في تصنيع مستحضرات للعناية بالبشرة طبقا لاحتياجات الفرد الخاصة.
كما أمدتها رحلتها إلى اليابان بالثقة التي جعلتها تراهن على مشروعها.
وتتذكر سابرينا أن زوجها كان يعتقد أن فكرتها "مثيرة"، لكنه تساءل عما إذا كان باستطاعتها إدارة نشاطها في ظل رعايتها لطفلين صغيرين.
وعلى الرغم من ذلك كانت سابرينا متمسكة بتنفيذ فكرتها، لذا استقالت وزوجها من عملهما واستثمرا مدخراتهما المالية في الشركة.
وتقول إنها أرادت أن "تتيح كل ما لديها للشركة".
افتتحت أول متجر لها في سنغافورة بعد عام واحد، وفي ظل وجود طفلين وشركة قيد التأسيس، لم تستطع سابرينا النوم أكثر من أربع ساعات يوميا.
وتقول : "كنت أفكر في كثير من الأحيان وأسأل نفسي هل ما أفعله صواب؟"
وبدأت الشركة، التي تبيع الأمصال والمراهم وأدوات تجميل عالية التكنولوجيا، تحقق نموا تدريجيا بعد مضي سنوات، وافتتحت متجرين جديدين.
وتبدلت حظوظ الشركة، بعد ست سنوات، بفضل صفقة توزيع مع شركة "سيفورا" الفرنسية العالمية المتخصصة في مجال مستحضرات التجميل، التي هيأت من جانبها مساحة للعرض في متاجرها ومواقعها التجارية على الإنترنت، على نحو أسهم في انتشار منتجات شركة "سكين إنك".
وتقول سابرينا إن سيفورا، المملوكة للشركة الأم "إل في إم إتش"، كانت مهتمة بمستحضر متخصص في العناية بالبشرة، وهو ما دفع أحد المسئولين فيها إلى زيارة متجر "سكين إنك".
وتتذكر سابرينا أن المسؤول وصف توفر منتج معين بحسب احتياج الشخص بأنه "طفرة كبيرة" ستجتذب الكثيرين، ورحب بشركتها.
وتقول إن "سكين إنك" تعد الآن إحدى العلامات التجارية الآسيوية المتخصصة في العناية بالبشرة والأكثر مبيعاً في سيفورا.

Wednesday, June 12, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

परिवार को क्रिकेट का जुनून विवेक के पिता सुदर्शन से मिला.
विवेक के पिता अपने समय में क्रिकेट क्लब में खूब क्रिकेट खेला करते थे. उनके पास उन दिनों की कई कहानियां हैं. वे अब 72 साल के हैं.
सुदर्शन बताते हैं, "जब हम सिंगापुर आए थे तो क्रिकेट को अपने साथ ही लाए थे. पहले मैं गवास्कर और द्रविड़ का बहुत बड़ा फैन था और अब मुझे धोनी बहुत पसंद हैं. उनके जैसा समझदार खिलाड़ी और कोई नहीं मिलेगा."
अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए सुदर्शन कहते हैं, "मैंने अपना सारा जीवन क्रिकेट के साथ काटा. मेरे बेटे और पोते भी अब क्रिकेट को लेकर उतनी ही रूचि रखते हैं. यह हमारे लिए पारिवारिक पहचान की तरह है."
विवेक का परिवार दो साल पहले से विश्व कप देखने की योजना बना रहा था. वे तभी से इस यात्रा के लिए पैसे जोड़ रहे थे.
विवेक इस बारे में बताते हैं, "हां, हमने इस यात्रा पर बहुत पैसा खर्च किया है. मैं इस बात का समर्थन करता हूं कि पैसा ज़रूरी है लेकिन किसी के लिए आपका प्यार और जुनून ज़्यादा ज़रूरी होता है."
2015 में विश्व कप देखने के लिए विवेक ऑस्ट्रेलिया गए थे. वो बताते हैं कि वो खेल को लेकर इतने उत्सुक थे कि उन्होंने बहुत पहले ही टिकट ख़रीद लिया था. उन्हें विश्वास था कि भारत जीतेगा लेकिन अंत में मायूस लौटना पड़ा था. इस बार भी विवेक आशा करते हैं कि भारत विश्व कप फाइनल जीतेगा.
क्रिकेट के लिए अपना प्यार ज़ाहिर करते हुए विवेक कहते हैं, "अगर ये कोई टेस्ट मैच होता तो इसे टीवी पर देख जा सकता था. लेकिन ये विश्व कप है, इसे कैसे टीवी पर देख सकते हैं?
हमलोग इस मैच का आनंद स्टेडियम में लेना चाहते थे और इस फ़ैसले से पूरा परिवार सहमत था. अगर हमें मैच देखने के लिए अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा भी खर्च करना पड़ता तो हम ज़रूर करते."
महाराष्ट्र का परिवार जो दो दशकों से अमरीका में रह रहा है और एक तमिल परिवार जो दो दशकों से सिंगापुर में रह रहा है, दोनों ही विश्व कप
फ़्रांस के नॉरमैंडी शहर में दूसरे विश्वयुद्ध के सबसे बड़े सैन्य अभियान 'डी-डे' की 75वीं वर्षगांठ मनाई गई, जहां प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी मौजूद रहे.
टेरीज़ा मे और फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने नॉरमैंडी की लड़ाई में मारे गए ब्रिटिश सैनिकों को सम्मानित करने के लिए स्मारक के उद्घाटन समारोह में भाग लिया.
गुरुवार को आगे और क्या कुछ हुआ, उसकी झलकियां तस्वीरों में देखें.
एक बैगपाइपर ने दिन की शुरुआत बैगपाइप के संगीत को बजाकर की. यह दृश्य 75 साल पहले की घटना को याद दिलाता है जब पहला ब्रिटिश सैनिक गोल्ड बीच पर उतरा था.
थेरेसा मे ने वेर-सर-मेर शहर में हो रहे समारोह में भाग लिया, जहां ब्रिटिश नॉरमैंडी मेमोरियल में पहला पत्थर रखने के लिए 6 जून 1944 की सुबह ब्रिटिश सेनाएं उतरी थी.
लड़ाई में मारे और घायल हुए ब्रिटिश सैनिकों को मैक्रों ने धन्यवाद कहा. साथ ही उन्होंने नॉरमैंडी में अब तक कोई स्मारक न होने को 'विसंगति' और 'असहनीय' बताया.
समुद्री तट की ओर अपनी बंदूके ताने तीन ब्रिटिश सैनिकों की नई स्मारक के सामने ब्रिटिश प्रधानमंत्री और फ्रांसीसी राष्ट्रपति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए.
डी-डे के 75वीं वर्षगांठ पर मारे और घायल ब्रिटिश सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए नॉरमैंडी के अरोमांचेस समुद्री तट पर कई स्थानीय निवासियों और विज़िटर्स को देखा गया.
ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि डी-डे पर अमरीकी सेनाओं की 'असाधारण ताकत' उनकी सच्ची और असाधारण भावना से आई थी.
देखने के लिए ब्रिटेन आए हैं.
ये दोनों परिवार एक-दूसरे से कभी नहीं मिले, न ही ये एक-दूसरे की भाषा बोलते हैं लेकिन ये दोनों एक स्टेडियम में मौजूद थे. भले ही एक-दूसरे को नहीं समझते हों लेकिन क्रिकेट के लिए इनका प्यार एक जैसा ही है, जो इन्हें जोड़ता है.
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